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Tagged: ओशो वाणी

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अहंकार के रूप

सुना है मैंने कि अकबर यमुना के दर्शन के लिए आया था। यमुना के तट पर जो आदमी उसे दर्शन कराने ले गया था, वह उस तट का बड़ा पुजारी, पुरोहित था। निश्चित ही,...

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एक अद्भुत अनुभव मुझे हुआ, वह मैं कहूं: ओशो।

एक अद्भुत अनुभव मुझे हुआ, वह मैं कहूं। अब तक उसे कभी कहा नहीं। अचानक ख्याल आ गया तो कहता हूं। कोई बारह साल पहले, तेरह साल पहले, बहुत रातों तक एक वृक्ष के...

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ज्ञान की एक दिशा थी, जो असफल हो गयी।

एक दूसरे ज्ञान की दिशा है, जिसको ब्रह्मविद्या कहा है। ब्रह्मविद्या का प्रयोग बिलकुल अन्यथा है। विज्ञान का प्रयोग है, चीजों को तोड़कर जानना। ब्रह्मविद्या का प्रयोग है, चीजों को उनकी सभ्यता में, जोड़...

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डरो मत! भयभीत न होओ!

जीवन के किसी भी अनुभव सेकभी भयभीत मत होना।क्योंकि जो भी भयभीत हो जाता है,वह पक नहीं पाता,वह समृद्ध नहीं हो पाता।जीवन के सब रंग भोगो।जीवन के सब ढंग जीओ।जीवन के सारे आयामतुम्हारे परिचित...

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तुम सिर्फ देखो: OSHO

दुख आये तो देखो–और जानते रहो कि मैं देखनेवाला हूं, मैं दुख नहीं हूं। और तुम बहुत चौंकोगे। इस छोटे-से प्रयोग को उतारो जीवन में। यह कुंजी है। इससे अमृत के द्वार खुल जाते...

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दुनिया में दो उपाय हैं बोझ से मुक्त होने के- OSHO

दुनिया में दो उपाय हैं बोझ से मुक्त होने के—एक तो यह है कि दायित्व छोड़ दो, भगोड़ा संन्यासी वही करता है। वह दायित्व ही छोड़ देता है; वह कहता है कि न रहेगा...

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ओशो महापरिनिर्वाण दिवस ( 19 जनवरी ) पर विशेष। ओशो ने अपने शिष्यों से किया है वादा !

भगवान बुद्ध के संबंध में कथा है कि वे मोक्ष के द्वार पर पहुंचकर, भीतर प्रवेश नहीं किये। वे करुणावश रुके गये, जब तक कि सारे लोग न आ जाएं। इसी संदर्भ में किसी...

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#ISDRadio सत्य की एक खूबी है, यदि तुम उसे ठीक से सुन लो तो फिर तुम उससे भाग न सकोगे: Osho

आपके प्रति इतना प्रेम रहते हुए भी आपको सुनते वक्त कभी कभी अकुलाहट और क्रोध क्यों उठने लगता है ?

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ओशो जन्मोत्सव विशेष… एक कदम से हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है। Osho

लाओत्से ने कहा है: एक कदम से हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है। दो कदम की जरूरत भी किसे है? एक बार में एक ही कदम उठता है। एक-एक कदम उठाते-उठाते हजारो...

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ओशो जन्मोत्सव पर विशेष…हंसो, जी भरकर हंसो। Osho

हंसो, जी भर कर हंसो। मेरा आश्रम हंसता हुआ होना चाहिए। हंसी यहां धर्म है। यह आनंद-उत्सव है। यहां उदास होकर नहीं बैठना है। यह कोई उदासीन साधुओं की जमात नहीं। उदासीनता को मैं...

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यहां किसी की मर्जी नहीं चलती, जो चलती है उसकी मर्जी चलती है। Osho

प्रश्न : भगवान, मैं अपने को बड़ा ज्ञानी समझता था, पर आपने मेरे ज्ञान के टुकड़े—टुकड़े कर के रख दिए। अब आगे क्या मर्जी है? धर्मेश, जो उसको मंजूर! मेरी क्या मर्जी? यहां मेरी...

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इस्लाम पर ओशो की अन्तरदृष्टी

मुस्लिम देशों में प्रवेश करना बहुत मुश्किल है – लगभग असंभव है, क्योंकि वे अभी भी असभ्य हैं। सभ्यता कहीं भी नहीं हुई है, लेकिन ऐसे देश हैं जो थोड़ा कम असभ्य हैं और...

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निंदा में तुम रस लेते हो, इसलिए बुराई बढ़ती जा रही है।

निंदा कोई करे, तो हम तत्काल मान लेते हैं। कोई कहे कि फलां व्यक्ति साधु, हम कभी नहीं मानते। हम कहते हैं, पता लगाकर देखेंगे। कोई कहे, फला आदमी चोर, व्यभिचारी, बदमाश, बिलकुल राजी...

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ऋषि कहते हैं, मेरी वाणी मेरे मन में ठहर जाए!

जो हम चारों तरफ बोलते रहते हैं, वह धीरे— धीरे हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। आपको भी बिना गवाह के पक्का नहीं हो सकता कि आप जो बोल रहे हैं वह सही है या...

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जीवन के क्षुद्रतम तथ्य भी अव्याख्य हैं। जब मैं कहता हूं जीवन अतर्क्य है, तब मैं कह रहा हूं कि जीवन अव्याख्य, इनडिफाइनेबल है।

आप उसकी व्याख्या नहीं कर सकते। जी सकते हैं, कह नहीं सकते, क्या है। और जब भी कहने जाएंगे, तो ऐसी ही गलती हो जाएगी, जैसी इस सूत्र का ऋषि कहकर पड़ गया गलती...

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यह उनका सदा का रूप था। अभी— अभी तो खूब खिल गया था, निखार आ गया था। लेकिन मुझे बचपन से याद है।

जब उनके पास बहुत सुविधा भी नहीं थी तब भी लुटाने में उन्हें रस था। उनकी जो मेरे मन में यादें हैं पुरानी—पुरानी से पुरानी यादें— लुटाने की हैं। वे कोई बहुत धनी व्यक्ति...

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श्री अरविंद को किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की स्‍वतंत्रता के संघर्ष की आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये

श्री अरविंद को किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की स्‍वतंत्रता के संघर्ष की आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब...

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दादू के चेले तो अनेक थे पर दो ही चेलों का नाम मशहूर है। एक रज्‍जब और दूसरा सुंदर।

आज आपको सुंदर कि विषय में एक घटना कहता हूं। दादू की मृत्‍यु हुई। तब दादू के दोनों चेलों ने बड़ा अजीब व्यवहार किया। रज्‍जब ने आंखे बंद कर ली और पूरे जीवन कभी...

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मुझे निरंतर लोग कहते हैं कि हम यह चाहते हैं-शांति चाहते हैं, आनंद चाहते हैं, आत्मा चाहते हैं। 

आप तो सब चाहते हैं, लेकिन चाहने से जगत में कुछ भी नहीं मिलता है। अकेली चाह बिलकुल इंपोटेंट है, बिलकुल नपुंसक है, उसमें कोई शक्ति नहीं है। चाह के पीछे संकल्प और श्रम भी...

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